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किशोर: भीगी भीगी रातों में, मीठी मीठी बातों में
ऐसी बरसातो में, कैसा लगता है?

लता: (ऐसा लगता है तुम बनके बादल,
मेरे बदन को भिगोके मुझे, छेड़ रहे हो ओ
छेड़ रहे हो ) - २

लता: (अम्बर खेले होली उई माँ
भीगी मोरी चोली, हमजोली, हमजोली ) - २
ओ, पानी के इस रेले में सावन के इस मेले में
छत पे अकेले में
कैसा लगता है

किशोर: ऐसा लगता है
तू बनके घटा अपने सजन को भिगोके खेल खेल रही हो ओ
खेल रही हो

लता: ऐसा लगता है
तुम बनके बादल मेरे बदन को भिगोके मुझे छेड़ रहे हो हो.
छेड़ रहे हो

किशोर: (बरखा से बचा लूँ तुझे
सीने से लगा लूँ
आ छुपा लूं आ छूपा लूँ ) - २
दिल ने पुकारा देखो रुत का इशारा देखो
उफ़ ये नज़ारा देखो
कैसा लगता है, बोलो?

लता: ऐसा लगता है कुछ हो जायेगा
मस्त पवन के ये झोकें सैंया देख रहे हो ओ
देख रहे हो
ऐसा लगता है
तुम बनके बादल मेरे बदन को भिगोके मुझे छेड़ रहे हो हो
छेड़ रहे हो

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@ndsun.cs.ndsu.nodak.edu)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@astro.indiana.edu)
		     
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