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ba.ndhan khulaa pa.nchhii u.Daa

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बंधन खुला पंछी उड़ा आगे सुनो अजी फिर क्या हुआ

फिर यूं हुआ छूटी जाल से प्यासी हिरनिया मिली ताल से
ऐसे धुला मेरा गोरा बदन चारों तरफ़ खिला फूलों का वन
ना जानूं क्या गाए जिया आगे सुनो अजी फिर क्या हुआ
बंधन खुला पंछी उड़ा ...

छुप छुप के वो जो है देखता इन्सान नहीं वो है देवता
रहना गवाह तुम खिलती कली मुद्दत के बाद मैं खुल के हँसी
जैसे किसी ने छू लिया आगे सुनो अजी फिर क्या हुआ
बंधन खुला पंछी उड़ा ...

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