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aur kitane Gam uThaa_e aadamii

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और कितने ग़म उठाए आदमी
क्यूँ जिए जब जी न पाए आदमी
और कितने ग़म उठाए ...

राह भूले जब मुसाफ़िर सामने तूफ़ान आए
हर क़दम के साथ मंज़िल और उससे ( दूर जाए ) -२
टूट कर क्यूँ गिर न जाए आदमी
क्यूँ जिए जब जी न पाए ...

एक सपने के लिए इस ज़िन्दगी को वार बैठे
दांव पर सब कुछ लगाया और बाज़ी ( हार बैठे ) -२
दर्द ये किसको सुनाए आदमी
क्यूँ जिए जब जी न पाए ...

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