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ai shaam\-e\-Gam bataa ke sahar kitanii duur hai

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ऐ शाम-ए-ग़म बता -२
ऐ शाम-ए-ग़म बता के सहर कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता
आँसू नहीं जहाँ वो नगर कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता

दम तोड़ती नहीं है जहाँ पर किसी की आस -२
वो ज़िंदगी की राहगुज़र कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता

अब कोई पासबाँ न कोई अपना हमसफ़र -२
मंज़िल हमारी किसको ख़बर कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता

कोई पुकारता है तुझे कब से ऐ ख़ुदा -२
कहते हैं तू है पास मगर कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता
ऐ शाम-ए-ग़म बता के सहर कितनी दूर है
ऐ शाम-ए-ग़म बता

Comments/Credits:

			 % Credits: Irfan
% Song Courtesy: http://hindi-movies-songs.com/
% Comments: A fine ghazal by Habib Jalib who was a great
% revolutionary/ political Poet. He was jailed by all the
% governments upto 1985.
% Just listen how KA has composed the word - "duur" wherever it
% comes and then "paas" in the last she'r
		     
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