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ai mere hamasafar, ik zaraa intazaar

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ऐ मेरे हमसफ़र, इक ज़रा इन्तज़ार
सुन सदाएं, दे रही है, मंज़िल प्यार की

अब है जुदाई का मौसम, दो पल का मेहमान
कैसे ना जाएगा अंधेरा, क्यूँ ना थमेगा तूफ़ान
कैसे ना मिलेगी, मंजिल प्यार की ...

प्यार ने जहाँ पे रखा है, झूम के कदम इक बार
वहीं से खुला है कोई रस्ता, वहीं से गिरी है दीवार
रोके कब रुकी है, मंज़िल प्यार की ...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@plains.nodak.edu)
% Credits: Satish Subramanian (subraman@cs.umn.edu)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@astro.indiana.edu)
		     
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