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ahad\-e\-Gam me.n bhii muskuraate hai.n - - Lata

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अहद-ए-ग़म में भी मुस्कुराते हैं
आँसुओं के दिये जलाते हैं

अपने दामन से किस लिये ऐ दोस्त
शम्म-ए-हस्ती मेरी बुझाते हैं

उनके दर से जबीं को टकराकर
अपनी तक़दीर को बनाते हैं

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Arunabha S Roy
% Date: 1 Feb 2005
% Series: LATAnjali
% generated using giitaayan
		     
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