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aaraa mai.n to girii re ko_ii sa.mbhaalo

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आरा मैं तो ( गिरी रे ) -४
( कोई स.म्भालो ) -२
आर मैं तो ( गिरी रे ) -२

अर्ज़ है हुज़ूर से दूर ही दूर से
पीने का मज़ा लो जीने का मज़ा लो
आरा मैं तो गिरी रे ...

प्यालियों को तोड़ दो शराब को छोड़ दो
नशा अगर चाहिए तो हमसे नाता जोड़ लो
आँखों से पिलाऊँगी प्यास बुझाऊँगी दुनिया भुलाऊँगी
अपने दिल में बसा लो
कोई स.म्भालो
आरा मैं तो गिरी रे ...

सबसे मुँह फेर दो एक नज़र हो इधर
मेरे इस जाम का नशा रहे उमर भर
ऐसा मज़ा आएगा जीते जी न जाएगा मस्त हो के गाएगा
कोई तो मुझको स.म्भालो कोई स.म्भालो
आरा मैं तो गिरी रे ...

Comments/Credits:

			 % Credits: Ashok Dhareshwar
		     
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