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aa.Nkho.n kii gustaakhiyaa.n maaf ho.n

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आँखों की गुस्ताखियां माफ़ हों
इक टुक तुम्हें देखती हैं
जो बात कहना चाहे ज़ुबां
तुमसे ये वो कहती हैं
आँखों की शर्म-ओ-हया माफ़ हों
उठी आँखें जो बात ना कह सकीं
झुकी आँखें वो कहती हैं
आँखों की गुस्ताखियां ...

काजल का इक तिल तुम्हारे लबों पे लगा लूं
हां चंदा और सूरज की नज़रों से तुमको बचा लूं
ओ पलकों की चिलमन में आओ मैं तुमको छुपा लूं
ख्यालों की ये शोखियां माफ़ हों
हरदम तुम्हें सोचती हैं
जब होश में होता है जहाँ
मदहोश ये करती हैं
आँखों की शर्म-ओ-हया ...

ये ज़िंदगी आपकी ही अमानत रहेगी ऐ हे
दिल में सदा आपकी ही मुहब्बत रहेगी ऐ हे
इन साँसों को आपकी ही ज़रूरत रहेगी
हां इस दिल की नादानियां माफ़ हों
ये मेरी कहां सुनती हैं
ये पल पल जो होती हैं बेकल सनम
तो सपने नए बुनती हैं
आँखों की गुस्ताखियां ...

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