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aaj nahii.n to kal bikhare.nge ye baadal

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आज नहीं तो कल बिखरेंगे ये बादल
ओ रात के भूले हुए मुसाफ़िर सुबह हुई घर चल
अब घर चल रे

जीवन इक संग्राम है जोगी
जीवन से क्या डरना
भवसागर के जाल बिछे हैं
बच-बच पार निकलना
चिन्ता छोड़ सकल
तेरा जायेगा भाग्य बदल
ओ रात के भूले हुए मुसाफ़िर, सुबह हुई घर चल
अब घर चल रे

जोड़ ले फिर से टूटी ममता
बाँध ले प्रेम की डोरी
ज़िंदगानी से दूर भागना
है मन की कमज़ोरी
ये सब दुःख के पल
इक दिन जायेंगे टल
ओ रात के भूले हुए मुसाफ़िर, सुबह हुई घर चल
अब घर चल रे

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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