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aa ga_ii yaad shaam Dhalate hii

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आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही

खुल गये सहर-ए-ग़म के दरवाज़े
इक ज़रा सी हवा के चलते ही

कौन था तू के फिर न देखा तुझे
मिट गया ख़ाब आँख मलते ही

तू भी जैसे बदल सा जाता है
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही

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